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Monthly Archives: December 2015

एक व्यक्ति का शोध-कारखाना

यह कहानी एक ‘फलां’ शहर की है। ‘फलां’ शहर को न तो आप बड़ा शहर मानेंगे न ही छोटा। एक ठीक – ठाक सा अधपका आधुनिक शहर है, जिसके शिक्षा प्रणाली की यहाँ के बड़े बुज़ुर्ग एक स्वर में जम के प्रशंसा करते है।  खैर, कहानी है मेरे पूर्व सहपाठी की, जो मेरा एक मित्र भी रहा है, जिससे  मैं एक बहुत ही लम्बे अंतराल के बाद मिली थी।  वो भी यूँ  ही सड़क पर से गुज़रते हुए। एक दूसरे की खैर-ओ-खबर लेने के बाद मैंने उससे पूछा, “तो रमन, यहाँ कैसे आना हुआ?”

“घर पर पढ़ना थोड़ा मुश्किल हो जाता है, तो मैं सुबह यहाँ आता हूँ और शाम तक बैठता हूँ। ”

“बहुत बढ़िया।  मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही है, मुझे घर पर बैठ कर पढ़ना नामुमकिन सा लगता है, तो मैं अपने एक दोस्त के  घर जाती हूँ जो सारा दिन खाली पड़ा रहता है और उसे अपना अड्डा बना लेती हूँ।” मैंने चुटकी लेते हुए यह कहा। “वैसे तुम भी तो पि. एच. डी. कर रहे हो न ?”

“क्या तुमने अख़बार नहीं पड़ा?”

“नहीं, क्या हुआ?” मैंने यह सोच के पूछा की शायद उसकी पि. एच. डी. पूरी हो गयी होगी, और फिर सोचा क्या पि. एच. डी. पुरे करने वाले लोगों के नाम अख़बारों में छपते है।

उसने कहा, “मैंने लिखित परीक्षा में शीर्ष स्थान प्राप्त किया है। मैंने बताया था तुम्हें, याद है।”

“हाँ ”

“खैर, बाद मैं मुझे पता चला की साक्षात्कार में लिखित परीक्षा में मिले अंको की कोई एहमियत नहीं है, अंतिम चयन साक्षात्कार के आधार पर ही होता है।  मुझे 20 में से 3 अंक मिले … मैंने सुचना के अधिकार के अधिनियम के अंतर्गत अपनी याचिका दायर की है, पर असल में मुझे कुछ होने की उम्मीद नहीं है, ख़बरों में भी इसका उस दौरान ज़िक्र था, की बहुत सारे राजनेताओं के भाई-बंधुओं को पि. एच. डी. में दाखिला मिल गया और जो मेरे जैसे योग्य लोग थे …. पर मैं पहली श्रेणी की नौकरी ले लिए तैयारी कर रहा हूँ … इस बार मेरा आखिरी
मौका है … देखते है की क्या होता है …. जो कुछ हुआ उसके बाद मेरा भी पि. एच. डी. करने का मन नहीं रह गया है। क्या फायदा ऋचा।  सिर्फ समय की बर्बादी है।

“हाँ, इसका फायदा तभी है जब आपको नौकरी इसके आधार पर मिले। ”
“हाँ, और बि. एड. कॉलेज में नौकरी मिलने का कोई फायदा नहीं है, वो आपको अच्छी तनख्वाह नहीं देते ….” कुछ पल चुप होने के बाद, “14 हज़ार, पर असल में ऐसा है नहीं की आपको इतने भी मिल जाए …. वो आपको 14 हज़ार पर दस्तखत करने के लिए कहेंगे, और असलियत में आपको उससे भी कम देंगे। मैं स्कूल में नौकरी करना ज़्यादा पसंद करूँगा, पर मैं एक सरकारी नौकरी पाना चाहता हूँ। ”

“अच्छा, तो असल में तुम स्कूली-शिक्षण में वापिस जाना चाहते हो। “

“दरअसल अब मैं एक ‘पेशेवर शोधकर्ता’ हूँ। तो, मैं इसको ही जारी रखना चाहूंगा।”

मैं कयास लगा रही थी की आखिर वो कहना क्या चाहता है।  शायद वो किसी अनुसन्धान संस्थान के साथ काम करना चाहता है, पर इससे पहले मैं कुछ कहती वो ही बोल पड़ा, “तुम्हें पता है पिछले एक साल में मैंने 15 एम. एड. और 5 पि. एच. डी. की है। ”

“क्या !!”

“हाँ, मैं उनके लिए सब कुछ करता हूँ। ”

“तो, तुम कितना पैसा लेते हो?”

“बीस हज़ार”

“और इस काम को करने के लिए कितना समय चाहिए होता है?”

“देखो, शोध-प्रारूप तो उन्हें खुद ही लिख कर देना होता है, फिर अध्याय 2 मैं नेट पर बैठता हूँ और लिख देता हूँ, मैं ही प्रपत्र/ उपकरण बनाता हूँ। फिर वो मुझे डेटा देते है, मैं विश्लेषण करता हूँ और रिपोर्ट तैयार करता हूँ। इसमें तक़रीबन १० दिन लग जातें है।

“हाँ, और इधर देखो … दो  साल हो गए है और मैं अभी तक डेटा इकट्ठा  करने में लगी हुई हूँ।

“पर तुम्हें इतना समय क्यों लग रहा है?”

मुझे नहीं पता था की मैं क्या कहूँ, मैं मुस्कुरा दी।

” रमन, यह एक बहुत बढ़िया व्यवसाय मॉडल है, पर यह बताओ की अगर साहित्य चोरी (plagiarism) की बात आयी, तो कौन पकड़ा जाएगा ?”
“ऐसा क्यों होगा? मैं काफी अच्छे से ध्यान रखता हूँ  …. “
“पर मान लो ऐसा होता है तो ”

“मैं ज़िम्मेदार नहीं होंगा।  मेरा नाम कहीं पर नहीं है। यह मेरी गलती नहीं है, लोग मेरे पास आते हैं, पर तूम मुझे बताओ वो करें भी तो क्या करें, वो एक साल में शोध सिखने में असक्षम है। और अब क्या  कहें, मैं उनका नाम ले सकता हूँ पर वो खुद फैकल्टी मेंबर्स है जिन्होंने मुझे उनका शोध करने के लिए कहा, वो काफी लम्बे समय से अपने शोध के साथ जूझ रहे थे एंड फिर उन्होंने मुझे करने के लिए कहा। ”

अब तक मैं कम से कम दो-तीन बार ज़ोर से हंस चुकी थी और मैं ये सोच रही थी की सड़क पर से गुजरने वाले लोग क्या सोच रहे होंगे। खुद को थोड़ा शांत करते हुए मैंने कहा, “रमन, फिर तो तुम्हें कोई नौकरी नहीं चाहिए, तुम्हारा खुद का ट्यूशन सेंटर है और इस फलते-फूलते व्यवसाय के चलते, कोई भी प्राइवेट जॉब तुम्हें इतना बढ़िया पैसा नहीं दे पाएगी। ”

“तुम सही कहती हो। मैंने पैसा बनाया है। इसी वजह से मैं बाक़ी सब छोड़ कर पढ़ाई कर पा रहा हूँ। पर कभी कभी मुझे ऐसा लगता है की मैं गलत कर रहा हूँ। फिर मैं यह भी सोचता हूँ की जो फैकल्टी मेंबर्स मुझसे अपनी पि. एच. डी. करवा रहे है, वो एम. एड. के विद्यार्थियों को क्या पढातें होंगे। ”

उसे खुश करने के लिए मैंने कहा “पर यह अच्छा है की तुमने मुझे एक नए व्यवसाय मॉडल के बारे में बताया। “
“रहने दो यार। यह कुछ नया नहीं है, यह काफी पुराना व्यवसाय मॉडल है। मैं इसमें नया-नया हुँ।  एक और “फलां ” शहर तो इसका मुख्यालय है, वहां आप उन्हें पचास हज़ार दीजिये और वो आपके लिए सारा काम कर देंगे, आप उनसे दो साल बाद मिलिए और सारा काम ले जाइये। ”

“पर स्कॉलर को अपना विवा तो ठीक-ठाक देना होता होगा ?”
“हाँ, पर इसके लिए उन्हें एक तैयार पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन भी तो मिलती है। “
“तो, तुम्हें ग्राहक कैसे मिलते है ?”
“ऐसे ही, विद्यार्थी आपस में बात करते है और मेरे मोबाइल पर कॉल आ जाती है। “
“शुक्र है तुमने यह नहीं कहा की फैकल्टी उन्हें सलाह देती है। “
नहीं, नहीं।  पर ऐसा भी नहीं है की फैकल्टी को इस बारे में नहीं पता होता।  कई बार मैं सीधा फैकल्टी मेंबर से ही परामर्श ले लेता हूँ, हम बस बिचोलिये को हटा देते है। ”

मुझे इस पर तो हंसी आनी ही थी।

“पर विडम्बना यह है की मैं अपनी पि. एच. डी.  नहीं कर पाया। ” उसने कहा।
रमन (नाम बदला हुआ ) द्वारा इंकित करी गई इस व्यापकता ने मुझे काफी ज़ोर का झटका दिया। आप इसके बारे में क्या कहेंगे, “एक व्यक्ति का शोध-कारखाना”